इट्स ऑल अबाऊट सेक्स बेबी!!!
On 06, Jul 2007 | 8 Comments | In Mindless Rants, Satire, व्यंग्य, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
ऊई, व्व्व्व्वो वाला सेक्स नहीं, वो लिंग वाला सेक्स। जब से स्त्रीलिंग अवतरित हुआ है, पुल्लिंग उसकी चाहत में दीवाना रहा है, और वो काम किए हैं जो अन्य हालात में नहीं करता, चाहे उसका अंजाम भुगतना पड़ा हो। चाहे वो मार्क एन्टोनी की रोम के खिलाफ़ बग़ावत हो या शाहजहाँ की दीवानगी, इतिहास ऐसी मिसालों से भरा पड़ा है। कोई चीज़ सही हो या न हो, लेकिन स्त्रीलिंग ने कह दिया कि “सही है” तो सही है जी, वहीच्च सही है बाकी सब अनसही…. मतबल गलत है!!
इट्स द इन थिंग!!
हर मूर्ख आज ब्लॉगर सिर्फ इसलिए बनना चाहता है ताकि ग्लोबल स्टेज का लाभ उठाए, सबको बताए कि वह कितना मूर्ख है! जय हो मूर्खता!!!
गूगल की नई खरीद
On 05, Jul 2007 | 9 Comments | In Technology, टेक्नॉलोजी | By amit
काफी टैम से गूगल ने कोई खास वेब प्रापर्टी नहीं खरीदी थी, लगता है कि गूगल के खरीद-फरोख़्त डिपार्टमेन्ट वाले उपल्ब्ध ऑप्शन्स एनालाइज़(analyse) कर रिये थे। और आखिरकार कर ली, मेरा मतलब ऑप्शन्स एनालाइज़!! तो लो भई, अब गूगलवा ने खरीद लिया फीडबर्नर को, और यह खबर उनके मुख्यपृष्ठ पर भी दिखाई दे रही है। फीडबर्नर शिकागो स्थित वेबसाइट है जो कि फीड वितरण सेवाएँ उपलब्ध करवाने के साथ-२ उनमें विज्ञापन आदि की सेवाएँ भी उपलब्ध करवाती है।
अल-जज़ीरा सबके लिए
On 04, Jul 2007 | 4 Comments | In Technology, टेक्नॉलोजी | By amit
ओ बाज़ार में बैठे लोगों .....
On 03, Jul 2007 | 4 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
अभी पिछले दो वर्षों में देशी और विदेशी कंपनियों के बड़े-२ स्टोर, मॉल आदि काफी तादाद में खुले हैं, धड़ाधड़ खुल रहे हैं और आगे भी खुलेंगे। उपभोग्ता वर्ग में बहुतों को इनके आने से प्रसन्नता हुई है, लेकिन कई देशी दुकानदारों आदि को बहुत टेन्शन हुई है और इस सबके खिलाफ़ बहुतों ने खुलकर अपना विरोध जताया है, कारण साफ है, ऐसे बड़े-२ स्टोर आने से उनकी दुकानदारी को खतरा है, अपना धंधा उनको बर्बाद होता दिखाई दे रहा है। इस विषय पर कई ब्लॉगर अपने विचार प्रस्तुत कर चुके हैं। लेकिन यदि इन दुकानदारों का धंधा बर्बाद हो रहा है या होने वाला है तो उसमें दोष किसका है?
डोमेन कैसा लें और कहाँ से लें .....
On 23, Jun 2007 | 13 Comments | In Technology, टेक्नॉलोजी | By amit
श्रीश ने कहा कि डोमेन आदि कैसे लें इस पर मैं एक लेख लिखूं तो आज समय मिलने पर मैंने सोचा कि चलो इस काम को भी निपटा दिया जाए। 😉 वैसे मैंने इस पर कोई दो वर्ष पहले अंग्रेज़ी में लिखा था – Shopping for a Domain? How to? – तो सोचा कि उसी से माल मसाला लेकर आज के हिसाब से अपडेट कर छाप देते हैं!! 😉 तो प्रस्तुत है जो मुझसे बन पाया। 🙂
तुन्गनाथ - भाग २
पिछले भाग से आगे …..
समीर जी ने पूछा कि नए स्लीपिंग बैग में ठंड झेल पाए कि नहीं, तो उसके संबन्ध में भी एक रोचक वाक्या हुआ। अब हुआ यूँ कि अपन नए स्लीपिंग बैग का कुछ अधिक ही भाव खा गए, और शुक्रवार की रात को केवल एक पतली सी टी-शर्ट और ट्रैक पैन्ट पहने ही घुस गए उसमें। थोड़ी देर बाद शरीर के ऊपरी भाग में ठंड सी लगने लगी, क्योंकि ऊपर से स्लीपिंग बैग खुला था!! जैकेट आदि पहन इसलिए नहीं सोया था कि सोचा स्लीपिंग बैग ही काफ़ी रहेगा!! 😉 तो गलती में कुछ सुधार करते हुए जैकेट को ओढ़ लिया और उसके बाद ठंड नहीं लगी!! 🙂 शनिवार की रात जो ऊपर तुन्गनाथ पर बिताई, तब तक समझ आ गई थी, इसलिए जैकेट और जुराब पहन के सोया था, बहुत गर्म सा रहा और अच्छी नींद आई, रविवार सुबह जल्दी ही उठ गया(बाकी सब मेरे से पहले उठ चुके थे) और अपने को बहुत तरोताज़ा महसूस किया। 😀
तुन्गनाथ - भाग १
मई 2007 के दूसरे सप्ताहांत पर पुनः तुन्गनाथ जाने का कार्यक्रम बना। पिछली बार का हादसा याद था, लेकिन जोश बरकरार था और मन में नई उमंग थी। इस बार की अपनी यात्रा भी अलग होनी थी, इस बार तम्बू वगैरह लेकर चल रहे थे, पैक्ड रेडी-टू-ईट(ready-to-eat) खाना साथ था जो कि तुरन्त बनने वाली किस्म का था। तुन्गनाथ पर पिछली बार की ठंड का अनुभव होने के कारण मैंने यात्रा पर निकलने से पहले ला-फूमा का नया स्लीपिंग बैग खरीदा जो कि 5 डिग्री सेल्सियस से 0 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान आराम से झेल लेता है; पहली रात तम्बू चोपता में लगाना था और समुद्र स्तर से लगभग साढ़े बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर रात को तापमान कम होने की पूरी आशा थी, मई में भी, क्योंकि इतनी उँचाई पर सारा साल ही ठंड रहती है। एक और खास बात यह थी कि यह व्हर्लविन्ड(whirlwind) यात्रा होनी थी क्योंकि यदि इसको आराम से करना हो तो चार दिन लगते हैं और हमे इसको तीन दिन में निपटाना था। 😉 इस बार दिल्ली से गाड़ी ले जाने की जगह हम हरिद्वार तक ट्रेन से गए और वहाँ से आगे जाने के लिए टाटा सूमो ली। केवल योगेश और मेरी ही यह तुन्गनाथ की दूसरी यात्रा थी, बाकी के पाँचों साथी पहली बार जा रहे थे।
