लगभग एक माह पहले मेरे इनबॉक्स में एक विज्ञापन वाली ईमेल आई। अब वैसे तो रोज़ ही कई सौ आती हैं लेकिन यह उन जैसी नहीं थी। यह इंडिया टुडे वालों की ओर से आई थी जिसमें उन्होंने मुझे इंडिया टुडे बुक क्लब की सदस्यता ऑफ़र की। शर्त यह थी कि उनके कैटालॉग में से मैं कोई भी दो पुस्तकें अथवा संगीत की सीडी खरीदूँ, वे मुझे उसी कैटालॉग में से मेरी पसंद की कोई चार पुस्तकें अथवा सीडी मुफ़्त में देंगे और साथ में सदस्यता भी जिसके अंतर्गत मैं भविष्य में हर खरीद पर छूट प्राप्त करूँगा।
वीर योद्धाओं के देश में - भाग ३
On 26, Feb 2007 | 7 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले अंक से आगे …..
सुबह उठ सभी जल्दी तैयार हुए और होटल में ही तुरन्त नाश्ता निपटा के दरगाह शरीफ़ की ओर निकल पड़े। पार्किंग में गाड़ी खड़ी कर हम लोग दरगाह की ओर चल पड़े। बाज़ार में हितेश और योगेश ने सुन्दर सी टोपियाँ खरीदीं।
( दरगाह में जाने के लिए तैयार )
हितेश तो लाल रंग की जैकेट, अपनी टोपी और धूप के चश्में के कारण किसी फिल्म का हीरो टाईप ऑटो ड्राईवर लग रिया था!! 😉 हमको बाज़ार में ही एक साहब मिले जो हमारा मार्गदर्शन करते हुए हमें दरगाह तक ले गए। दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर आदि ले कर हमने दरगाह में प्रवेश किया, वे साहब निरंतर हमारे साथ मार्गदर्शन करते हुए चल रहे थे। फ़िर एक जगह अंदर अंदर प्रवेशद्वार पर वे रूके, वहाँ बैठे मुल्ला जी ने हमें अपने सामने बिठा हमसे अजमेर शरीफ़ के दरबार में दुआ मंगवाई।
वीर योद्धाओं के देश में - भाग २
On 11, Feb 2007 | 7 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले अंक से आगे …..
तारागढ़ में मैंने कुछ अच्छी तस्वीरें ली थीं परन्तु फिर भी मन थोड़ा खिन्न था, कदाचित् किले की अनुपस्थिती देख। बहरहाल अब हम तारागढ़ से नीचे वापस अजमेर में आ गए और पता पूछते हुए अना सागर के नाम से प्रसिद्ध कृत्रिम तालाब की ओर बढ़ चले। वहाँ पहुँच के लगा कि पहले भोजन कर लिया जाए, लगभग सभी क्षुधा पीड़ित थे, तो पास ही मौजूद “पंडित भोजनालय” में जाने की सोची। लेकिन वहाँ अंदर जाकर कुछ का मन बदल गया, वहाँ खाने का उनका मन नहीं था, लेकिन हमारे ड्राईवर साहब अपने भोजन का ऑर्डर दे चुके थे, तो इसलिए हम लोग भी बैठ गए कि जैसे ही वे अपना भोजन समाप्त करेंगे तो हम चल के किसी अन्य रेस्तरां में भोजन लेंगे।
पाँच बातें
On 10, Feb 2007 | 21 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
हद हो गई, जीवन कितनी शांति से मस्त चल रहा था, अचानक ही बेन ने मुझे टैग कर दिया!! चलो अब कर दिया तो कर दिया, निपट लेते हैं!! 😉
वैसे पिछली बार अल्का जी ने मुझे खूब फ़ंसाया था टैग कर, लेकिन इस बार मामला थोड़ा आसान है!! 😉 इस बार सिर्फ़ अपने बारे में पाँच ऐसी बातें बतानी हैं जो आमतौर पर अन्य लोगों(यानि कि आपके ब्लॉग के पाठकों) को नहीं पता!! तो अर्ज़ करते हैं:
वीर योद्धाओं के देश में - भाग १
On 03, Feb 2007 | 4 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
अभी हाल ही में, यानि कि कुछ दिन पहले ही, पर्वतों में नव-वर्ष का स्वागत किया परन्तु घूमने फ़िरने का कीड़ा पुनः कुलबुला रहा था, इसलिए फिर कहीं घूम आने की सोची। इस बार किसी पर्वतीय स्थल की ओर न जाने का निर्णय लिया, सर्दियों का मौसम है इसलिए धूप से नहाया राजस्थान हमें आवाज़ दे बुला रहा था। पिछले वर्ष नवंबर के अंत में उर्स के दौरान जहाँ हम न जा पाए, उस वीरों के देश अजमेर घूम आने का हमने मन और प्रोग्राम बनाया। जैसे कि अब आदत हो गई है और जैसा कि अब अपेक्षित रहता है, इस यात्रा के आरम्भ में भी वही पुरानी नौटंकियाँ हुई, कलाकार लोगों की आदत आराम से थोड़े ही छूटती है!! 😉 बहरहाल, हमेशा की तरह अपना इरादा पक्का था, साथ देने वालों की कमी नहीं थी, तो अपना रायता नहीं बिखरा। 26 जनवरी का शुक्रवार था, इसलिए तीन दिन की सप्ताहांत की छुट्टी थी, तो मैं, योगेश, एन्सी और शोभना 25 जनवरी की रात को अजमेर की ओर निकल पड़े। साथ में एन्सी के मित्र मनीष भी थे जो अपने घर जयपुर जा रहे थे, अब चूँकि जयपुर अजमेर के रास्ते में ही पड़ता है इसलिए हमने उनको जयपुर तक लिफ़्ट देना सहर्ष स्वीकार लिया। स्निग्धा और हितेश 26 की शाम तक अजमेर पहुँचने वाले थे क्योंकि स्निग्धा की बंगलूरू से दिल्ली की उड़ान 26 तारीख़ की सुबह की थी।
पर्वतों में नव वर्ष - भाग ३
On 01, Feb 2007 | 6 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले भाग से आगे …..
अगले दिन सुबह जल्दी उठ सभी तैयार हुए, नाश्ता कर वापसी की राह पकड़ने को सभी आतुर थे। लेकिन जल्दी निकलना कदाचित् किस्मत में नहीं था, रिसॉर्ट वाले से पंगा हो गया। दिल्ली से जब बुकिंग करवाई थी तो उसने कमरों का किराया 1000 रूपये प्रति दिन के हिसाब से बताया था और बिल में उसने उनके 1800 और 2800 रूपये लगा दिए थे यह कहकर कि 1000 वाले कमरे उपलब्ध नहीं थे। कहने का अर्थ यह कि हमें उसके अनुसार महंगे कमरे में ठहरा दिया और हमें बताना भी उचित नहीं समझा कि जो कमरे हमें दिए जा रहे हैं वे महंगे हैं!! बिल की जाँच करने से पता चला कि साहब ने खाने-पीने के बिल इत्यादि जोड़ने में भी घपला किया हुआ था, 1000 रूपये खामखा के अधिक लगा रखे थे। तो बस बिल को लेकर तकरीबन एक घंटा बहस हुई और फ़िर हम अपने मन मुताबिक पैसे देकर वहाँ से चल दिए। लान्सडौन जाने वाले ध्यान रखें, इस अनुभव के आधार पर मैं रिट्रीट आनंद नामक जंगल रिसॉर्ट में रहने की किसी को सलाह नहीं दूँगा, वहाँ अन्य होटल आदि भी हैं, गढ़वाल मण्डल वालों का यात्री निवास भी है जहाँ ठहरा जा सकता है।
हिन्दी में बात करके प्रसन्नता होगी .....
On 14, Jan 2007 | 17 Comments | In Some Thoughts, कुछ विचार | By amit
पहले भी कई बार लिखा जा चुका है, मैंने भी लिखा है तथा अन्य लोगों ने भी लिखा है, कि क्या कारण हो सकते हैं कि लोग हिन्दी जानते हुए भी हिन्दी में बात नहीं करते। जब भी किसी अच्छे हाई-फ़ाई रेस्तरां में जाता हूँ और वहाँ पर पूछा जाता है:
हैलो सर! व्हॉट वुड यू लाईक टु हैव?
या किसी अन्य संस्थान में जाओ तो वहाँ पर स्वागत कक्ष में बैठी महिला पूछतीं हैं:
अपना नाम स्वयं कैसे खराब करें?
On 10, Jan 2007 | 2 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
क्या सिर्फ़ मेरा तजुर्बा ऐसा रहा है या वाकई भारतीय व्यवसायिक वेबसाइटें ऐसी हरकतें करती हैं जो कि समझदारी से बहुत दूर होती हैं?? पिछले कई वर्षों में ऐसे कई नमूने देखे हैं, अब ताज़ा तरीन नमूना पेश-ए-खिदमत है।
कुछ अरसा पहले वेबचटनी नामक कंपनी ने बड़े धूम धड़ाके के साथ एक ट्रैवल संबन्धी वेबसाइट ओके टाटा बॉय बॉय आरम्भ की थी जिसे वे लोग आज भी भारत की पहली ऑनलाइन ट्रैवल बिरादरी कहते है। अब कहने को तो हर कोई अपने को पहल करने वाला कहता है तो इसलिए इनके इस दावे को चुनौती नहीं दे रहा, लेकिन अब कोई खुद ही अपना नाम डुबाने की कोशिश करे तो क्या करें? इस वेबसाइट से कभी कभार विज्ञापन वाली ईमेल भेजी जाती है जिसमें वेबसाइट पर कुछ नया आरम्भ होने या किसी और बात की जानकारी दी जाती है। यहाँ तक तो सब ठीक है लेकिन समस्या आगे आती है। अब पता नहीं यह प्रबंधक समिति की समझदारी है या इस वेबसाइट के तकनीकी पक्ष संभालने वालों की, ये लोग ईमेल में अपना पता(जहाँ से ईमेल आई है) हमेशा गलत डालते हैं। पहले याहू/जीमेल जैसी मुफ़्त वाली ईमेल दिखाते थे और हर बार याहू के स्पैम फ़िल्टर उस ईमेल को स्पैम समझ इन्बॉक्स के बाहर बिठा देते थे।
ग्लोबल वायसिस में हिन्दी
On 08, Jan 2007 | 12 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
ग्लोबल वायसिस हॉर्वर्ड लॉ स्कूल के बर्कमैन सेन्टर फ़ॉर इंटरनेट एण्ड सोसाईटी द्वारा स्थापित एक अव्यवसायिक संस्था है जिसका उद्देश्य(कम शब्दों में) दुनिया के अलग अलग कोनों से लोगों के विचार ब्लॉग, पॉडकॉस्ट आदि द्वारा सभी तक पहुँचाना है। विश्व के अलग अलग हिस्सों के अलग अलग संपादक और लेखक हैं जो अपने अपने प्रांतों में हो रहे ब्लॉग संवाद आदि को अंग्रेज़ी में ग्लोबल वायसिस के ब्लॉग द्वारा बताते हैं।
(अब मैं उनके बारे में पूर्ण जानकारी का हिन्दी में अनुवाद नहीं कर पाऊँगा, इसलिए अंग्रेज़ी में उसे यहाँ पढ़ें)
पर्वतों में नव वर्ष - भाग २
On 05, Jan 2007 | No Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले भाग से आगे …..
सुबह सवेरे मोबाईल में अलार्म बजते ही निद्रा खुल गई, ऐसा लगा कि जैसे अभी कुछ मिनट पहले ही तो सोए थे(4 घंटे पहले सोए थे)। नींद खुलने के बाद ठण्ड लगने लगी थी, रात को चढ़ाई गर्मी का असर समाप्त हो गया था, उस की वजह से रात निकल गई थी यही बहुत था वर्ना बहुत बुरा हाल हो सकता था। बाहर आकर हमने सुहावनी सुबह के दर्शन किए, सूर्य पर्वतों के पीछे से उदय हो रहा था और राहत की बात यह थी कि हल्की हल्की धूप दिखाई दे रही थी, कोहरा आदि कुछ भी नहीं था। हम सभी उठ कर लड़कियों के कमरे की ओर चल पड़े और जाकर देखा कि अभी तो वे भी नहीं उठे थे। बहरहाल क्योंकि हम लोगों का जल्दी निकलने का कार्यक्रम था इसलिए सभी फ़टाफ़ट तैयार होने लगे, रिसॉर्ट का एक कर्मचारी थोड़ी थोड़ी देर में हमको गर्म पानी लाकर दे रहा था और एक-एक कर सभी तैयार होते जा रहे थे। शीघ्र ही तैयार हो हम अपने रास्ते निकल लिए, मन्ज़िल थी कुछ दूरी पर स्थित ताड़केश्वर महादेव मंदिर जो कि भारत के सबसे पुराने सिद्धपीठों में से एक है।
