फूड गाइड (Food Guide), रेस्तरां गाइड (Restaurant Guide), ईटिंग आऊट गाइड (Eating Out Guide) आदि आजकल काफ़ी मिल जाती हैं, खास तौर से यदि आप दिल्ली या मुम्बई जैसे शहर में हैं। हर गाइड में उनके अपने हिसाब से भिन्न-२ श्रेणियों में भिन्न-२ रेस्तराओं की सूचि होती है, चाहे फिर वह चीनी हो या जापानी, कॉन्टीनेन्टल योरोपियन हो या इटैलियन, फ्रेन्च हो या लेबनीज़। लेकिन इन सभी संदर्शिकाओं में मैंने एक बात यह देखी है कि बहुतया बेकार फालतू रेस्तराओं को अच्छे अंक मिले हुए होते हैं, जहाँ खाना औसत या निम्न स्तर की गुणवत्ता का है वहाँ उसको उत्तम बताया गया होता है। कारण? पता नहीं, बहुत से संभावित कारण हैं। चूंकि इन संदर्शिकाओं को छापने वाले प्रकाशकों के अपने मापदण्ड होते हैं इसलिए हमे नहीं पता कि किन मापदण्डों पर प्रकाशित रेस्तराओं आदि को आंका गया। लेकिन अब एक अलग ही प्रकार की संदर्शिका आई है जो क्राऊडसोर्सिंग पर आधारित है।
लद्दाख क्रॉनिकल्स - भाग २
On 02, Jun 2012 | 5 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले अंक से आगे …..
तो बिस्कुट, नमकीन, जूस आदि का पर्याप्त स्टॉक लेकर हम वापस होटल आ गए। पांगोंग सो (Pangong Tso) जाने के लिए आवश्यक आज्ञापत्र बनकर आ गए थे। यह लेह में ही बनते हैं और जाते समय दो जगह पर सेना वालों द्वारा जाँचे जाते हैं। यदि आप भारतीय नागरिक हैं तो इनको बनवाना झंझट वाला काम नहीं है, प्रत्येक (परमिट की चाह रखने वाले) व्यक्ति को अपना भारतीय सरकार द्वारा जारी ओरिजनल पहचान पत्र देना होता है (वोटर आईडी, पासपोर्ट, सरकारी महकमे का पहचान पत्र आदि) जिस पर फोटो और पता आदि दर्ज हो। आप जिस भी होटल में ठहरेंगे वे लोग यह बनवा देते हैं, स्वयं परमिट वाले दफ़्तर के धक्के खाने की आवश्यकता नहीं होती।
लद्दाख क्रॉनिकल्स - भाग १
On 29, May 2012 | 3 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
जिसको पता चला वो ज़रा हैरानी जताते हुए पूछता है – “अच्छा लद्दाख हो आए?!”, और मैं शांतिपूर्वक उत्तर देता हूँ – “हाँ हो आए”। लेकिन मन में भीतर एक हलचल होती है, हैरानी भी होती है कि दूसरा व्यक्ति इस रहस्योद्घाटन से इतना हैरान क्यों है? ऐसा तो नहीं कि मैं चाँद पर होकर आया हूँ या टिम्बकटू की सैर निपटा के आया हूँ। चचा बतोले की भांति यह भी मैं नहीं कहता कि बस जॉगिंग करते-२ वहाँ पहुँच गया था और एकाध घंटे में लौट आया!! मानो लद्दाख न हुआ हव्वा हो गया, कश्मीर-श्रीनगर बोलता तो लोगों को इतना आश्चर्य न होता!
पुष्कर - भाग २
On 16, May 2012 | 2 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
पिछले अंक से आगे …..
थोड़ा ऊपर जाकर सोचा कि देखें पुष्कर कैसा लगता है। बात यूं है कि ऊँचाई से किसी भी शहर आदि को देखने का अपना अलग ही मज़ा है। बड़े शहरों में यह मज़ा आप किसी ऊँची इमारत पर चढ़ कर ले सकते हैं, उनकी कोई कमी नहीं होती लेकिन पुष्कर जैसे शहर में, जहाँ कदाचित् ही कोई इमारत चार-पाँच मंज़िला से ऊँची होगी, यह काम किसी पहाड़ी पर चढ़ कर ही किया जा सकता है और ठीक ऐसी ही एक पहाड़ी पर आधा हम लोग चढ़ चुके थे। तो जो नज़ारा हमने देखा वह आप भी देखो!! :tup:
पुष्कर - भाग १
On 10, May 2012 | 7 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
बहुत दिन हुए थे कहीं घूमना फिरना नहीं हुआ था। जब से पिछले वर्ष अगस्त में दिल्ली वापसी हुई उसके बाद से मानो ज़िन्दगी थम सी गई, ठहराव आ गया था। अब घर वालों की सुनें तो इस वर्ष जनवरी में जो सुबह-गए-रात-वापस टाइप जो हरिद्वार जाना हुआ था वह इस ठहराव को छिन्न-भिन्न करने के लिए काफ़ी था, बोले घूम-फिर तो आए तुम, अब क्या करना है घड़ी-२ घूमने की रट छोड़ो। अब मैं समझाता कि वो तो एक मित्र को उसकी शादी से पहले पाप मुक्त कराने गंगा जी के पवित्र जल में डुबकी लगवाने के लिए जाना भर हुआ था बस, कोई घूमने फिरने के लिए थोड़े ही गए थे, तो इस पर घरवालों का ऐसा घूरना होता कि मानो हम बेअक्ल हो और अहमकपन वाली बात कर रहे हों। 😕
