कुछ दिन पहले ऐसे ही बैठे थे कि मेरी बेटी ने कहा कि पृथ्वी बहुत बड़ी है। पता नहीं मेरे मन में क्या आया कि मैंने उसी छोर से बात को पकड़ा और हम ग्रहों नक्षत्रों की बात करने लगे। मैंने उसको बताया कि हमारे सौर मण्डल में ज्यूपिटर सबसे बड़ा ग्रह है – वो इतना बड़ा है कि उस पर मौजूद लाल तूफ़ान ही पृथ्वी से बड़ा है और स्वयं ज्यूपिटर इतना बड़ा है कि उसमे लगभग 1300 पृथ्वी समां सकती हैं। और हमारा सूर्य इतना बड़ा है कि उसमे लगभग 1000 ज्यूपिटर समां सकते हैं।
अब इस पर मेरी बेटी की उत्सुकता बढ़ गई और उसने पूछा कि क्या सूर्य सबसे बड़ा है। अब यह तो एक अलग ही पिटारा खुल गया। तो उसको फिर मैंने सरल शब्दों में अन्य बड़े तारों और ब्लैक होल्स के विषय में बताया कि ब्रह्माण्ड में ऐसे तारे और ब्लैक होल हैं जिनके आगे हमारा सूर्य भी मानो मोहल्ले का बल्ब लगे।
मतलब सच में, हमारी पृथ्वी तो वैसे ही ब्रह्माण्ड के हिसाब से धूल का कण है। लेकिन जब Stephenson 2-18 जैसे तारों और TON 618 या Phoenix A* जैसे ब्लैक होल की बातें पढ़ो, तो लगता है कि धूल का कण भी शायद कुछ ज़्यादा इज़्ज़तदार उपमा हो गई।
Stephenson 2-18 एक लाल महादानव तारा है। लाल महादानव मतलब ऐसा तारा जो अपने जीवन के उस दौर में पहुँच चुका है जहाँ वह फूल कर बहुत बड़ा हो गया है। अब “बहुत बड़ा” से मतलब वैसा बहुत बड़ा नहीं है जैसा शादी-ब्याह में “बहुत बड़ा पंडाल लगा है” बोलते हैं। यहाँ मामला सचमुच दिमाग घुमाने वाला है। इसके आकार का एक अनुमान है कि इसका अर्धव्यास (radius) सूर्य से लगभग 2150 गुणा हो सकता है। अगर यह अंदाज़ा सही मान लें और Stephenson 2-18 को हमारे सूर्य की जगह रख दें तो यह लगभग शनि ग्रह की कक्षा तक फैल सकता है। यानी बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति – सबको आराम से अपने पेट में रख लेगा। कोई डकार भी नहीं आएगी। यह इतना बड़ा है कि इसके आयतन (volume) में लगभग 10 अरब सूर्य समां सकते हैं।

यहाँ एक छोटी-सी वैज्ञानिक अड़चन यह है कि इस तारे के आकार के अनुमान को लेकर अनिश्चितता है। विज्ञान में ऐसा होता रहता है। दूर बैठे तारे को नापना कोई दर्ज़ी की दुकान पर नाप देने जैसा काम नहीं है कि फीता निकाला और हो गया। वहाँ ल्यूमिनोसिटी, तापमान, दूरी आदि का खेल है। इसलिए Stephenson 2-18 को “सबसे बड़ा तारा” बोलना catchy तो है, लेकिन साथ में छोटा सा “शायद” भी लगाना चाहिए।
लेकिन इंटरनेट को “शायद” से एलर्जी है। यहाँ सब कुछ “सबसे बड़ा”, “सबसे तेज़”, “वैज्ञानिक भी हैरान” टाइप होना चाहिए। वरना लिंक कौन क्लिक करेगा भई? 😉
फिर घूम फिर के हम ब्लैक होल पर आए। बेटी को समझ नहीं आया कि ब्लैक होल क्या होते हैं (वैसे समझ तो बड़े-२ तुर्रम खां नहीं पाए हैं) लेकिन कोशिश की गई थोड़ा सरल भाषा में समझाने की।
TON 618 एक क्वासर (quasar) है। आसान भाषा में कहें तो ब्लैक होल के इर्द गिर्द एक मैटर का चक्र (accretion disk) होता है जो उसके गुरुत्वाकर्षण में फंस चुका होता है जिसको ब्लैक होल निगल जाता है। लेकिन यह सब निगलने में कुछ लाख वर्ष लगते हैं। और जैसे-२ ब्लैक होल इस मैटर को निगलता जाता है वैसे-२ घर्षण से तापमान बढ़ता जाता है। जो अति विशाल (super massive) ब्लैक होल होते हैं उनका गुरुत्वाकर्षण भी अधिक होता है और मैटर चक्र भी। तो घर्षण से बहुत अधिक तापमान बढ़ जाता है और वह एक प्रकाश पुंज बन जाता है। आम भाषा में इसी को क्वासर कहते हैं।
TON 618 इतना अधिक प्रकाश छोड़ने वाला क्वासर है कि उसकी गैलेक्सी में कहीं भी अंधकार नहीं होगा और हर ओर अंधा कर देने लायक प्रकाश फैला हुआ होगा। यह ब्लैक होल इतना विशालकाय है कि इसका द्रव्यमान (mass) 60 अरब सूर्यों के बराबर समझा जाता है।

60 अरब सूर्य बोले तो?
एक सूर्य ही हमारे सौर मण्डल का राजा बना बैठा है। उसके गुरुत्वाकर्षण का रौब ऐसा है कि सारे ग्रह लाइन में घूम रहे हैं। और इधर TON 618 है जिसके सामने सूर्य भी बोलेगा – “भाई साहब, मैं तो बस छोटा-मोटा काम करता हूँ।”
TON 618 का जो प्रकाश हम आज देख रहे हैं वह इसकी 10-11 अरब वर्ष पहले की स्थिति दिखाता है – उस समय न ही हमारा सूर्य था और न ही पृथ्वी। आज के समय में यह पृथ्वी से लगभग 18 अरब प्रकाश वर्ष की दूरी पर है और यह ब्लैक होल कई अरब वर्ष पहले ही अपने मैटर चक्र को पूर्णतया निगल कर सुप्तावस्था में जा चुका होगा। लेकिन हमें कभी ऐसा नज़र नहीं आएगा क्योंकि हम इसका भूतकाल देख रहे हैं। इस बात में भी एक अलग प्रकार का रोमांच है। हम आसमान में केवल जगह नहीं देख रहे होते, समय भी देख रहे होते हैं। Telescope एक तरह की time machine ही है, बस इसमें बैठकर selfie नहीं ले सकते।
अब Phoenix A* की बात करें तो यह Phoenix Cluster नामक गैलेक्सियों के समूह के केंद्र में है। Phoenix Cluster खुद भी कोई छोटी-मोटी सोसाइटी नहीं है, यह बहुत विशाल और X-ray छोड़ने वाली गैलेक्सियों का समूह है। इसके केंद्र की गैलेक्सी में एक अति विशाल ब्लैक होल माना जाता है जिसे Phoenix A* का नाम दिया गया है।
इसका द्रव्यमान 100 अरब सूर्यों के बराबर बताया जाता है। यानी TON 618 से भी बड़ा। अब सुनने में तो यह मस्त लगता है। “ब्रह्माण्ड का सबसे बड़ा ब्लैक होल मिल गया!” – इस शीर्षक पर तो कोई भी क्लिक कर देगा। हम भी कर देंगे, इतनी ईमानदारी तो रखनी चाहिए।

लेकिन यहाँ थोड़ा रुकना चाहिए।
Phoenix A* के द्रव्यमान का अनुमान सीधे नाप से नहीं आया है। वैज्ञानिकों ने इसकी गैलेक्सी की प्रकृति आदि देखकर अनुमान लगाया है। यह अनुमान सही भी हो सकता है, लेकिन इसे उसी आत्मविश्वास से बोलना कि “बस यही सबसे बड़ा है”, थोड़ा जल्दबाज़ी वाला काम होगा।
विज्ञान में “हमें लगता है” और “हमने नाप लिया है” में फर्क होता है। इंटरनेट पर दोनों को मिलाकर “वैज्ञानिकों ने खोज लिया” बना दिया जाता है। यही असली मसाला है।
तो सबसे बड़ी खगोलीय वस्तु कौन सी है?
अब यहाँ एक और मज़ेदार लफड़ा है। “सबसे बड़ी खगोलीय वस्तु” बोलते ही सवाल उठता है – वस्तु के क्या मायने हैं?
तारा?
ब्लैक होल?
गैलेक्सी?
गैलेक्सी समूह?
सुपर क्लस्टर?
कॉस्मिक वेब जैसे बहुत बड़े ढांचे?
अगर द्रव्यमान की बात है तो गैलेक्सी समूह और सुपर क्लस्टर खेल में आ जाएँगे। अगर radius की बात है तो लाल महादानव तारे अलग लाइन में खड़े हो जाएँगे। अगर ब्लैक होल की बात है तो TON 618, Phoenix A* वगैरह की कुश्ती चालू हो जाएगी। और अगर प्रत्यक्ष ब्रह्माण्ड ही वस्तु मान लिया जाए तो फिर बाकी सब बेचारे बच्चों की रेस में आ जाएँगे।
इसलिए “सबसे बड़ा” सुनते ही पहला सवाल होना चाहिए – किस हिसाब से?
आकार?
द्रव्यमान?
चमक?
दूरी?
या फिर ज्ञान बघारने वाले की क्षमता?
हमारी औकात और ब्रह्माण्ड का पैमाना
ऐसी चीज़ें पढ़ने और जानने का एक फायदा है – व्यक्ति थोड़ा विनम्र हो जाता है। हमारी रोज़ की चिंताएँ – बिजली का बिल, सड़क पर ट्रैफिक, ऑफिस का काम करते समय सर्वर का बैठ जाना, चाय में चीनी कम, फलाँ ने व्हाट्सप्प पर उत्तर नहीं दिया – ये सब अपनी जगह हैं, लेकिन ब्रह्माण्ड के पैमाने पर सब कुछ बहुत छोटा लगने लगता है।
यह छोटा लगना डिप्रेसिंग भी हो सकता है, लेकिन मुझे तो इसमें अजीब सा सुकून लगता है। हम छोटे हैं पर इतने भी बेकार नहीं। इसी छोटी सी पृथ्वी पर बैठे लोग ऐसे उपकरण बना रहे हैं जिनसे वे अरबों प्रकाश वर्ष दूर की चीज़ों का अंदाज़ा लगा रहे हैं। यह अपने आप में कमाल है।
सोचिए, एक प्रजाति जो अभी तक अपने शहरों के गड्ढे ठीक से नहीं भर पाई, वह ब्लैक होल के द्रव्यमान का अनुमान लगा रही है। यह बात अपने आप में थोड़ी हास्यास्पद भी है और शानदार भी।
Stephenson 2-18, TON 618, Phoenix A* – ये नाम सुनने में साइंस फिक्शन फिल्म के किरदार जैसे लगते हैं, पर ये हमारी वास्तविकता का हिस्सा हैं। या फिर यूं कहें कि हमारी अभी तक की समझ और ज्ञान का हिस्सा हैं। जैसे-२ हमारी समझ और ज्ञान विकसित होंगे इनमें से कुछ अनुमान बदल सकते हैं। आज जिसे सबसे बड़ा कह रहे हैं, कल कोई और निकलेगा। विज्ञान का यही मज़ा है। यह अंतिम उत्तर देने का मामला नहीं है; यह लगातार बेहतर सवाल पूछने का गोरखधंधा है।
और जहाँ तक ब्रह्माण्ड की बात है, वह इतना बड़ा है कि हमारा “सबसे बड़ा” भी शायद उसके लिए बस “अच्छा बच्चे, कोशिश करते रहो” वाली बात हो।
फिर भी, अगली बार रात को आसमान देखें तो याद रखिए – जो अँधेरा दिख रहा है, उसमें कहीं ऐसे तारे और ब्लैक होल मौजूद हैं जिनके आगे हमारा पूरा सौर मण्डल भी चिल्लड़ जैसा है।
इन सब महानुभावों के आकार के अंतर को समझाने के लिए मुझे यूट्यूब पर यह वीडियो मिला:
अब हम यहाँ बैठे सोच रहे हैं कि कल ब्लॉग पर इस सब को ठेलें या नहीं।
चलो लिख दिया अब, ऐसी चीज़ों पर लिखना बनता है। 😀

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