प्राय: सुनने में आता है कि हिन्दी पुस्तकें खरीदने के मामले में लोग कंजूसी दिखाते हैं, वे उसका लिखित दाम देने से कतराते हैं इसलिए बढ़िया पुस्तकें नहीं बिकती, जबकि अंग्रेज़ी पुस्तकें 500-800 दाम होने के बावजूद बिक जाती हैं! पता नहीं अब इसमें कितनी सच्चाई है, लेकिन इतना कह सकता हूँ कि मैं कोई पुस्तक दाम देख के नहीं खरीदता। पुस्तक महँगी होगी तो मैं उसका सस्ता संस्करण खोजने का प्रयत्न करता हूँ या फिर यह देखता हूँ कि सस्ती कहाँ से मिल सकेगी। जैसे हैरी पॉटर की पिछली पुस्तकें तकरीबन 900 रूपए के लिखित दाम पर आईं, तो पिछली दो पुस्तकें मैंने ऑनलाईन खरीदीं जहाँ वे मुझे 300 रूपए के डिस्काऊँट पर मिल गईं। ऐसे ही एक उपन्यास की शृंखला का नया उपन्यास आया था तो हार्ड कवर (hard cover) में आया था जो कि 700 रूपए का था, थोड़ी प्रतीक्षा की तो उसका पेपरबैक (paperback) संस्करण भी आ गया जिसके सिर्फ़ 350 रूपए चुकाए!! :tup: दाम बचाने के लिए पॉयरेटिड पुस्तकें खरीदना अपने को नहीं भाता है क्योंकि उसमें प्रकाशक और लेखक दोनों का पैसा मारा जाता है और चोर (जो पॉयरेटिड छाप रहा है) की खामखा की कमाई हो जाती है। :tdown:
राग दरबारी और हिन्दी पुस्तकों पर कंजूसी
On 03, Mar 2009 | 16 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
On 28, Feb 2009 | 7 Comments | In कतरन | By amit
कॉलसेन्टरों में अनपढ़ों की भर्ती हो रही है कदाचित् आजकल!! मूर्खों की भर्ती होती है यह तो पहले से ही पता है लेकिन अनपढ़ों का मामला अभी पता चला। महानगर टेलीफोन निगम के कस्टमर केयर में फोन लगाया यह पूछने के लिए कि डू नॉट डिस्टर्ब (Do Not Disturb) रजिस्ट्री में रजिस्टर करने के बाद भी टेलीमार्केटिंग संदेश क्यों आ रहे हैं। जो बंदा मिला उसने पहले सीधे बोल दिया कि 90 दिन लगते हैं सेवा चालू होने में, तो मैंने कहा कि मुझे 45 दिन कहा गया था लेकिन 90 दिन भी हो चुके हैं तो वह अड़ गया कि नहीं हुए हैं, आपने 17 नवंबर 2008 को रजिस्टर किया था। मैंने कहा कि हिसाब लगा ले कितने दिन हुए हैं, मेरे हिसाब से तो 17 फरवरी 2009 को 92 दिन पूरे हो चुके हैं। इस बात का हिसाब लगाने के लिए उसने मेरी कॉल को होल्ड पर रखा और दस मिनट बाद हिसाब लगा के आया!! उँगलियों पर गिन के 10 सेकन्ड में लगाए जा सकने वाले हिसाब को करने में उसे 10 मिनट लगे और फिर आकर मुझसे बहस करने लगा कि सेवा की प्रमोशन करने वाला एसएमएस (SMS) टेलीमार्केटिंग नहीं है इसलिए ये तो आएँगे और कॉल काट दी!! 😡
यानि कि एक तो अनपढ़ और ऊपर से बद्तमीज़ भी!! तौबा!! कॉल सेन्टर में भर्ती होने के लिए नियम बनना चाहिए कि व्यक्ति कम से कम बारहवीं पास तो हो, इतना जरा सा हिसाब तो सातवीं फेल भी लगा सकता है!! 🙄
दिल्ली का दूसरा और बंगलूरू का पहला ब्लॉगकैम्प.....
On 25, Feb 2009 | 7 Comments | In Blogging, ब्लॉगिंग | By amit
दिल्ली का पहला ब्लॉगकैम्प हुए काफ़ी समय हो गया, उस ब्लॉगकैम्प में काफ़ी मज़ा आया था, कई लोगों से मिलना हुआ था, ब्लॉगिंग संबन्धित अलग-२ विषयों पर लोगों के विचार जाने थे। अब समय है फिर से एक नए ब्लॉगकैम्प का। लेकिन एक ही पर क्यों सब्र करें? पेप्सी वाले नहीं कहते – ये दिल माँगे मोर (रंगबिरंगा पंछी नहीं)!! और फिर शाहरूख खान भी तो आए दिन टेलीविज़न पर कभी किसी कार्यक्रम के दौरान या कभी किसी मैच के दौरान कहते हैं – डोन्ट भी संतुष्ट, थोड़ा और विश करो!! 😀 तो इसलिए इंडियन ब्लॉग एण्ड न्यू मीडिया सोसायटी इस बार एक नहीं वरन् दो ब्लॉगकैम्प आयोजित कर रही है!!
कॉमिक्स से उपन्यास तक.....
On 12, Feb 2009 | 8 Comments | In Memories, यादें | By amit
उपन्यास….. इनको पढ़ना पहली बार तब हुआ जब मैं चौथी या पाँचवीं कक्षा में था। उस समय जिस स्कूल में था वहाँ तो पुस्तकालय के नाम पर एक दड़बा टाइप कमरा था जहाँ कम से कम हम लोगों का प्रवेश वर्जित था। उन दिनों मैं कॉमिक्स पढ़ा करता था। छुट्टियों में नानी जी के घर आया हुआ था तब की बात है, एक दिन मौसी अपने कॉलेज के पुस्तकालय से प्रेमचन्द के दो उपन्यास – गोदान और गबन – लाईं अपने पढ़ने के लिए। एक तो वे पहले से ही पढ़ना आरंभ कर चुकीं थीं तो कौतुहलवश दूसरे को मैंने पढ़ना आरंभ किया, कौन सा पहले पढ़ा यह ध्यान नहीं लेकिन अंत-पंत दोनों पढ़े। उसके बाद सेवासदन और मानसरोवर भी पढ़े, माँ और मौसी हैरानी से देखते थे कि कैसे पढ़ पा रहा हूँ ऐसे गंभीर उपन्यास लेकिन मुझे समझ में यह नहीं आता कि वे इनको इतना हाई-फाई क्यों मानते थे, एक कहानी ही थी और कुछेक चीज़ों को छोड़ सब समझ आ ही रहा था मुझे, मैं तो मात्र एक कहानी के रूप में ही उनको पढ़ रहा था। प्रेमचन्द के चार उपन्यास पढ़ डाले लेकिन लेखन स्टाईल मुझे पसंद नहीं आया, कहानियाँ रोचक न लगीं!!
On 04, Feb 2009 | 7 Comments | In कतरन | By amit
बंगलूरू में रवि रतलामी जी से हुई मुलाकात माइक्रोसॉफ़्ट की सॉफ़्टवेयर लोकलाइज़ेशन संबन्धित एक कॉन्फरेन्स के दौरान। बीयर वाली हवाई सेवा का अनुभव लगभग अच्छा रहा, वापसी की उड़ान में एक एयर होस्टेस ने मेरी सुईड जैकेट पर कॉफी गिरा दी। कोई और होता तो उसकी ऐसी की तैसी कर देता पर यहाँ भूल समझ मामला छोड़ दिया, जैकेट ड्राईक्लीन होने ही देनी है। 😉 तीन घंटे बैठ आराम से रवि जी से बातें की गई, शुएब बाबू को मिलने को कहा लेकिन संपर्क देरी से होने के कारण उनके आने का समय नहीं था, तो मुलाकात अगली बार के लिए टल गई।
On 25, Jan 2009 | 6 Comments | In कतरन | By amit
आज संडे है….. दारू पीने का दिन है!! नहीं यह मैं नहीं कहता, बस एकाएक ही बीस वर्ष पहले आई फिल्म चालबाज़ का वह सीन याद आ गया जब रजनीकांत का टैक्सी ड्राईवर वाला किरदार अंगूरी की बोतल ले खुशी से झूमता हुआ गा रहा होता है – “आज संडे है….. दारू पीने का दिन है” और एकाएक ही रंग में भंग पड़ जाता है क्योंकि बोतल में दारू की जगह श्रीदेवी ने घासलेट (मिट्टी का तेल) भर दिया होता है!! 😀 फिल्म में इसी तरह के कई लोटपोट कर देने वाले सीन थे!!
वैसे आज संडे….. यानि कि रविवार है ही, लेकिन अपन बिना दारू के ही काम चला लेंगे – उसके नाम वाली वेन्गर्स की चॉकलेट ज़िन्दाबाद! 😀 :tup:
होनी को कौन टाल सकता है!!
On 24, Jan 2009 | 6 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
सप्ताह भर पहले ही की तो बात है – बन ठन की समस्या ने पुनः आ घेरा था कि मौसेरी बहन के विवाह में क्या पहना जाए!! तमाम तरह के सुझाव दिए गए, आखिरकार घरवालों की सम्मति से फैसला किया गया कि विलायती बन-ठन की जाएगी मॉडर्न इश्टाईल में – विलायती इश्टाईल ब्लेज़र जीन्स के साथ। यानि कि ब्लेज़र पर रोकड़ा खर्च करना ही पड़ेगा!! 😮 तो इसी मनसूबे को अन्जाम देने मामाजी के बड़े लड़के को साथ ले पिछले ही सप्ताहांत पहुँच गए क्नॉट प्लेस। वहाँ कई ब्रांड देखी – अमेरिकी कंपनी वैन ह्यूसेन (Van Heusen) का माल पसंद नहीं आया, घणा बड़ा शोरूम और चवन्नी छाप दुकान की भांति जरा-२ सा माल रखा हुआ था। ब्लैकबैरी (Blackberry) की दुकान ही दड़बे साइज़ की थी तो वहाँ भी कुछ न मिला। आखिरकार लुई फिलिप (Louis Philippe) के शोरूम में पहुँचे लेकिन वहाँ भी पंगा हो गया। जिस प्रकार का ब्लेज़र पसंद नहीं आया उसमें तो अपना साइज़ उनके पास था और जो ब्लेज़र पसंद आया उसमें माकूल साइज़ नहीं था – गड़बड़ घोटाला!!
On 24, Jan 2009 | 2 Comments | In कतरन | By amit
फीडबर्नर से गूगल पर अपने सभी ब्लॉगों की फीड को स्थानांतरित कर लिया है। चूँकि फीड फिर भी अपने ही डोमेन पते से बाँटी जाती है इसलिए फीड के पते पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा और पुराने वाले पते धड़ल्ले से काम करेंगे (अभी तो फिलहाल कर ही रहे हैं) तथा जो श्रद्धालु पुराने भक्त हैं (यानि कि फीड को सबस्क्राइब किए हुए हैं) उनको भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। :tup: यदि फीड को अपने डोमेन से न बाँट कर फीडबर्नर के डोमेन से बाँटा जा रहा होता तो खामखा की सिरदर्दी होती, क्योंकि तब फीड पते बदल जाते। 😈
अभी तो सब मामला सही दिखे है, फिर भी यदि किसी को कोई समस्या नज़र आए (मेरे द्वारा संचालित किसी ब्लॉग पर) तो बताने का कष्ट अवश्य करें। :tup:
वेन्गर्स की चॉकलेट.....
On 23, Jan 2009 | 10 Comments | In Here & There, इधर उधर की | By amit
फोटो साभार – Vintage Home Arts
दिल्ली के क्नॉट प्लेस में भीतर वाले चक्र में एक प्रसिद्ध बेकरी है – वेन्गर्स (Wenger’s)। यह काफ़ी पुरानी बेकरी है, तकरीबन 75 वर्ष पुरानी। इसकी पेस्ट्री आदि तो बढ़िया होती ही हैं, मुझे इसकी बनाई चॉकलेट कुछ खासी पसंद हैं। होता यूँ भी है कि ये लोग चॉकलेट का जैसा नाम रखते हैं उसमें वैसा माल भी डालते हैं, यानि कि बादाम होगा चॉकलेट का नाम तो उसके अंदर कुरकुरे बादाम डले हुए होंगे, काजू नाम होगा तो उसमें काजू डले होंगे!!
स्लमडॉग करोड़पति और प्रतिभा विहीन अमिताभ बच्चन
On 17, Jan 2009 | 15 Comments | In Mindless Rants, Movies, फ़ालतू बड़बड़, फ़िल्में | By amit
अभी कुछ दिन पहले हल्ला सुना एक फिल्म के बारे में, नाम स्लमडॉग मिलियनेयर (Slumdog Millionaire)। यह एक फिल्म है जो कि एक अंग्रेज़ ने बनाई है कि कैसे एक स्लम में पला बड़ा हुआ लड़का एक “कौन बनेगा करोड़पति” टाइप के कार्यक्रम में जीत की कगार पर पहुँच जाता है और सब उसकी इस उपलब्धि से सन्न रह जाते हैं। जिन लोगों ने फिल्म देख ली उनसे सुनने/पढ़ने में आया कि फिल्म बहुत ही धांसू है, फिल्म ने अवार्ड वगैरह भी जीत लिया!! आने वाले शुक्रवार, 23 जनवरी को यह फिल्म भारत में “स्लमडॉग करोड़पति” के नाम से हिन्दी में रिलीज़ हो रही है। मैं भी सोच रहा था कि शायद मैं भी देख आऊँगा सिनेमा पर क्योंकि मैं भी उन लोगों में हूँ जिन्होंने इंटरनेट से पॉयरेटिड कॉपी डाउनलोड कर नहीं देखी है और सिनेमा में देखने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं प्रतीक्षा नहीं कर रहा, मूड हुआ तो देख आएँगे और यदि जानने वालों से खास समीक्षा नहीं मिली तो नहीं देखेंगे, कोई बड़ी बात नहीं है!!
