अभी थोड़ा समय पहले ही वर्डप्रैस डॉट कॉम वालों ने अपना पहला $$ वाला अपग्रेड निकाला था, जब लोगों की बढ़ती माँग को देख उन्होंने अपनी थीम अपने आप डिजाईन करने वालों के लिए $15 का Edit CSS वाला अपग्रेड उपलब्ध करवाया। लोगों की एक और जबरदस्त माँग, अपना ब्लॉग अपने डोमेन पर डाल सकने की काबिलियत, को भी इन ज़हीन लोगों ने सुन लिया है और अब आप $15 सालाना के खर्च पर वर्डप्रैस डॉट कॉम वालों से डोमेन खरीद अपना वर्डप्रैस डॉट कॉम ब्लॉग उस पर रख सकते हैं अन्यथा यदि आपके पास डोमेन पहले से ही है तो आपको केवल $10 सालाना खर्च देना होगा उस पर अपना वर्डप्रैस डॉट कॉम ब्लॉग डालने के लिए। (आधिकारिक घोषणा)
वर्डप्रैस डॉट कॉम आपके पते पर .....
On 25, Oct 2006 | 3 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
आश्चर्य क्यों .....
On 20, Oct 2006 | 9 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
रवि जी द्वारा पता चला कि देसीपंडित बंद हो रहा है, फ़िर कुछ अन्य चिट्ठों पर भी पढ़ा, उन पर की गई टिप्पणियाँ भी पढ़ी। वैसे तो मुझे यह टिप्पणी रवि जी के ब्लॉग पोस्ट पर करनी चाहिए थी, पर खैर, बहुत समय से मैंने भी नहीं लिखा था यहाँ कुछ तो सोचा यही लिख दिया जाए ताकि लोग बाग़ कहीं यह ना समझ लें कि हमने भी ब्लॉग को अपने तिलांजलि दे डाली!! 😉
करें या ना करें?
On 08, Oct 2006 | One Comment | In Blogger Meetups | By amit
नहीं जी, कोई गलत अर्थ मत निकालना, कुछ ऐसा वैसा करने की नहीं सोच रहे। दरअसल आज इंडिया हैबिटैट सेन्टर में दिल्ली ब्लॉगर्स बिरादरी की एक भेंटवार्ता रखी गई थी। अब कोई ऐसी वैसी भेंटवार्ता नहीं थी, बकायदा एक मुद्दा था जिस पर चर्चा की गई। बात यूँ है कि अभी हाल ही में चेन्नई में एक ब्लॉगकैम्प आयोजित किया गया था। तो हमें लगा कि ऐसा कुछ यहाँ उत्तर भारत में दिल्ली में भी होना चाहिए, अब बहुत से यहाँ के लोग तो वहाँ जा नहीं पाए थे, और बहुत से जो गए थे उनको निराशा हुई क्योंकि कुछ “खास” नहीं मिला वहाँ जिसकी आशा लिए वो वहाँ गए थे।
पता नहीं .....
On 14, Sep 2006 | 7 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
पता नहीं क्या हो रहा है, आजकल कुछ लिखने का मन ही नहीं करता। मेरा यह ब्लॉग जिस पर मैंने सोचा था कि अपने दिल की भड़ास निकाला करूँगा, यह अभी पिछली कुछ पोस्ट से लग रहा है कि एक ट्रैवल ब्लॉग बन के रह गया है, सिर्फ़ यात्राओं का वर्णन होता है और कुछ नहीं। या यूँ कहें कि लिखने के लिए कोई प्रेरणा नहीं मिल रही। अब यह मत पूछना कि प्रेरणा कौन है, क्योंकि अभी तो मुझे भी नहीं पता!! 😉
बादलों के उस पार - भाग ३
On 01, Sep 2006 | 14 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
गतांक से आगे …..
चोपटा से निकल हम उखीमठ की राह पकड़ी और उसके बाद रास्ता पूछ सियालसौर की ओर बढ़ चले। रास्ते भर सुन्दर पहाड़ी नज़ारे देखते हुए चल रहे थे, ऐसा लग रहा था कि मानो जन्नत में घूम रहे हैं। पर अब जन्नत बहुत ज़्यादा हो गई थी। कुछ देर को तो मैं गृहासक्त महसूस करने लगा, पहाड़ी नज़ारे कुछ अधिक ही हो गए थे, यात्रा का हमारा तीसरा दिन था, अभी घर पहुँचने में कम से कम एक पूरा दिन और दो रातें बाकी थी। पिछले एक-दो महीनों में कुछ अधिक ही पहाड़ देखे थे, इतने अभी तक के अपने जीवन में कुल मिलाकर ना देखे थे। हमारा पहले तो ऋषिकेश में भी रूकने का विचार था परन्तु फिर सभी ने निर्णय लिया कि बस सियालसौर में ही एक दिन रूकेंगे और उसके सीधे दिल्ली।
बादलों के उस पार - भाग २
On 25, Aug 2006 | 9 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
गतांक से आगे …..
चोपटा की ओर जाते समय मार्ग में एक से बढ़कर एक नज़ारे देखने को मिले। सुबह का समय था, कहीं कहीं हल्की धूप पड़ रही थी और सुहावना मौसम था। मन ही नहीं कर रहा था कि कहीं जाएँ, बस एकटक बैठे प्रकृति की सुन्दरता को निहारते रहें।
आखिरकार हम चोपटा पहुँच ही गए। सुबह के लगभग साढ़े नौ बजे थे और आस पास ऊपर देखने पर केवल धुंध एवं कोहरे के बादल ही दिखाई दे रहे थे। सामने के ढाबे पर हमको पिछली रात मिले अंकल एवं उनका परिवार बैठा दिखाई दिया, तो उनसे बचने के लिए साथी लोग दूसरी दुकान पर चाय के लिए चले गए। चाय आदि के बाद सभी चलने के लिए तैयार थे। ऊपर ठण्ड का मुकाबला करने के लिए हमने चॉकलेट आदि ली, मैंने ऊपर चढ़ने में सहायता के लिए एक डंडी ली और हम लोग अपनी 4 किलोमीटर की पैदल चढ़ाई पर निकल चले।
बादलों के उस पार - भाग १
On 23, Aug 2006 | 11 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
नया सवेरा और एक और नई यात्रा पर जाने का पिरोगराम। 😉 इस बार मंज़िल थी पंच केदारों में तृतीय केदार तुन्गनाथ। दिल्ली से लगभग 495 किलोमीटर का सड़क का सफ़र कर पहुँचना था चोपटा और वहाँ से 4 किलोमीटर का पैदल सफ़र कर और लगभग 3000 फ़ीट की चढ़ाई कर पहुँचना था तुन्गनाथ। वैसे वहाँ घोड़े आदि भी चलते हैं लेकिन हम लोग तो पैदल ही चलने का पिरोगराम बनाए थे। ज़्यादा नहीं, इस बार हम केवल 4 लोग ही थे यात्रा पर।
स्वर्ग में या स्वर्ग के निकट - भाग २
On 09, Aug 2006 | 5 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
गतांक से आगे …..
अब फ़ूलों इत्यादि की तस्वीरें ले चुके तो सोचा कि थोड़ा आराम किया जाए, लगभग आठ घंटे गाड़ी में सफ़र किया था, हाल थोड़े ढीले ढाले ही थे। तो वापस ऊपर पहुँचे, अरे अपने कमरों में भई, उससे ऊपर जाने का अभी टैम नहीं आया!! 😉 तो ऊपर पहुँच देखा कि यार लोग सुस्ता रहे हैं, हम सोचे कि हम भी थोड़ा सुस्ता लें। पर सुस्ता नहीं पाए, निश्चय किया कि तुरत फ़ुरत नहा धो तैयार हो लिया जाए और फ़िर घूमने फ़िरने का पिरोगराम सैट किया जाए। लेकिन उससे पहले पेट-पूजा का प्रश्न था, तो यात्री निवास में ही नाश्ते का निश्चय किया गया। तो दो कुड़ियाँ खटिया तोड़ अंदाज़ में अपने कमरे में सुस्ता रही थी, संतोष नाश्ता करने के आदि नहीं, तो हम बाकी के पाँच जन नीचे डाईनिंग हॉल में आ गए और पूरी-छोले तथा ब्रेड ऑमलेट के मजे लिए। तभी हमारी वार्ता यात्री निवास के मैनेजर साहब से हुई, सरल से व्यक्ति लगे। हम लोगों से पूछा कि हमारा कहाँ जाने का कार्यक्रम है, तो हमने उनसे पूछा कि हमें कहाँ जाना चाहिए। उन्होंने कई जगह बताई, कलसी में उपस्थित इतिहास की धरोहर के बारे में भी बताया(अरे बताते हैं, सब्र रखो भई), और बताया कि हम चक्राता पहाड़ पर भी जा सकते हैं, लेकिन चूंकि उसका एक तरफ़ा रास्ता लगभग 40 किलोमीटर के करीब है, तो सांय काल तक ही लौटना होगा। गर्मी कुछ बढ़ सी गई थी, तो हमने सोचा की पहाड़ की सैर कर ली जाए, बाकी जगह समय होने पर देख लेंगे। मैनेजर साहब हमारे साथ चलने को तैयार थे। तो पेट पूजा के बाद नहाने आदि की सुध ली, इतने में बाकी की दोनों देवियों ने भी अपना काम निबटा लिया और सज धज सभी नीचे पहुँचे। पर वहाँ तो एक नया सीन खड़ा हो गया था, हमारे सरदारजी, अरे ड्राईवर साहब, नदारद थे। कहाँ गए किसी को पता नहीं। मैं और दीपक बाहर आस पास की दुकानों और “शेर-ए-पंजाब” ढाबे पर भी देख आए कि कहीं बैठे मुर्गे वगैरह तो नहीं पाड़ रिये, पर वो तो गधे के सिर से सींग और सरकार की देशभक्ति की तरह गायब थे। हम लोग यात्री निवास के द्वार पर खड़े टेन्शन ले ही रहे थे कि दीपक को एक कर्मचारी ने कहा कि पीछे मौजूद खाली हॉलों में देख लें, सो हम उधर ही लपक लिए। एक हॉल के द्वार के बाहर दो कुत्ते बैठे रखवाली कर रहे थे, उसके अन्दर एक बिस्तर पर ड्राईवर साहब मौज से सो रहे थे, हमने उन्हें हिला-डुला के जगाया और चलने के लिए कहा। फ़ौरन पगड़ी बाँध वो तैयार हुए और हम निकल पड़े।
स्वर्ग में या स्वर्ग के निकट - भाग १
On 03, Aug 2006 | 11 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
ना, यह कोई धार्मिक अथवा आध्यात्मिक प्रवचन नहीं है, यह तो एक और यात्रा का विवरण है। हाँ, लगता है कि जुलाई का महीना मेरे लिए यात्राओं का महीना ही था, एक ही माह में दो-दो यात्राएँ!! अभी जयपुर यात्रा और ब्लॉगर भेंटवार्ता की यादें ताज़ा ही थीं कि मैं निकल पड़ा एक और यात्रा पर।
इस बार रूख था कलसी की ओर, प्रसिद्ध पांवटा साहिब से थोड़ा आगे, देहरादून से लगभग 50 किलोमीटर पहले, हिमाचल और उत्तरांचल की सीमाओं पर बसा एक छोटा सा कस्बा, जहाँ रखी है इतिहास की एक धरोहर। कौन सी धरोहर? बताएँगे भई, समय आने पर सब बताएँगे, सब्र रखो। 🙂
जयपुर ब्लॉगर भेंटवार्ता - भाग २
On 25, Jul 2006 | 6 Comments | In Blogger Meetups, Wanderer, घुमक्कड़ | By amit
गतांक से आगे …..
तो हम गाईड लिए किराए की जीप में आगे बढ़ चले। पर थोड़ा रूकें, एक बात तो बताना भूल ही गए!! गाईड और जीप लेकर चलने से पहले नीरज भाई तथा प्रतीक बाबू ने टशन में आ एक एक बीयर की बोतल पकड़ फ़ोटो खिंचवाने की फ़रमाईश की, तो हमने उन्हें निराश नहीं किया, आप भी मत करें और यह फ़ोटो देखें। 😉
किन्गफ़िशर ज़िन्दाबाद
