पिछले अंक से आगे …..
रात और गहराई तो ठण्ड बढ़ी। कुछ देर ऐसे ही लेटा रहा, जैकेट में लिपटा और दो रजाईयों के नीचे दबा हुआ। दरअसल समस्या ये है कि भीषण गर्मी तो मैं झेल लेता हूँ लेकिन ठण्ड अधिक नहीं झेली जाती। लेकिन अब ठण्ड लग रही थी काफ़ी, जैकेट और दो रजाईयाँ ना-काफ़ी थी। घड़ी में देखा तो उसने तंबू के अंदर का तापमान आधा डिग्री सेल्सियस बताया, यानि कि बाहर यकीनन शून्य से नीचे तापमान था। खैर, अपन उठे, दो लौंग दांतों के बीच दबाई, थोड़ी गर्माहट महसूस हुई और फिर से रजाई में घुस गए कि किसी तरह रात कट जाए, अगले दिन सुबह तो निकल लेना है यहाँ से।
