आज मैंने जैसे ही इस ब्लॉग के नियंत्रण भाग में डैशबोर्ड को खोला तो स्वतः ही मेरी नज़र वर्डप्रैस डॉट कॉम(wordpress.com) के सबसे लोकप्रिय चिट्ठों और तेज़ी से लोकप्रिय होते चिट्ठों की सूचि पर गई और तेज़ी से लोकप्रिय होते चिट्ठों की सूचि में चौथे स्थान पर अपने ब्लॉग को देखकर एक अजीब से आनंद की अनुभूति हुई!! 😀
आज छुट्टी थी!!
On 09, Feb 2006 | 6 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
आज मुहर्रम की छुट्टी थी। वैसे तो यह एक सरकारी छुट्टी होती है, परन्तु निजी क्षेत्र में यह अमूमन नहीं दी जाती, जहाँ तक मैं जानता हूँ, मेरे किसी भी कामकाजी मित्र की छुट्टी नहीं थी। पर मेरी थी, और यही बहुत है!! 😀
तो कल जब बॉस मुझे एक प्रोजेक्ट के बारे में बता रहे थे, तो मैंने कहा:-
मैं: बॉस, कल तो छुट्टी है, मजे आ गए!! 😀
बॉस: (कैलेंडर में देखने के बाद) कल तो मुस्लिम छुट्टी है, तुमने क्या करना है।
मैं: कुछ भी हो, छुट्टी तो है!! कल मैं सारा दिन नींद लूँगा।
बॉस: क्यों? इतनी थकान का क्या कारण है? अब तो सप्ताहांत की छुट्टी होती है।
मैं: हाँ, होती तो है परन्तु मैंने पिछले शनिवार छुट्टी न लेकर काम किया था और रविवार को भी नींद न ले पाया था। (लेकिन मैंने यह न बताया कि सारा दिन क्रिकेट खेलता रहा)
बॉस: ओह, तो ठीक है, मजे करो, लेकिन हमें यह काम कल तक फ़ाईनल करना है।
मैं: (मन ही मन सोचा) कमब्खत छुट्टी के दिन भी चैन नहीं मिलेगा!! 🙁
फ़ूट डालो, राज करो!!
On 09, Feb 2006 | 3 Comments | In Sports, खेल | By amit
अंग्रेज़ चले गए लेकिन अपनी विरासत के रूप में अपनी प्रसिद्ध नीति छोड़ गए, जिसने उन्हें पूरे भारतवर्ष की अलग अलग ६०० से अधिक रियासतों पर राज करवाया। अब पाकिस्तानी मीडिया और पूर्व क्रिकेटर आदि भी शायद इसी नीति का प्रयोग कर भारतीय खेमे में गर्मी पैदा करने के चक्कर में हैं।
कल हुए एक दिवसीय मैच में पाकिस्तान के कप्तान इंज़माम के आऊट होने पर भी एक विवाद सा खड़ा हो गया है, और पाकिस्तान के पूर्व कप्तान और विकेटकीपर बल्लेबाज़ मोईन खान का कहना है कि द्रविड़ को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उनका इशारा उस वाक्ये की ओर है जब इंज़माम के एक शॉट को फ़ील्ड करके सुरेश रैना ने इंज़माम को क्रीज़ से बाहर पाकर गेंद विकेट की ओर उन्हें आऊट करने के इरादे से फ़ेंकी और इंज़माम ने क्रीज़ से काफ़ी बाहर होते हुए भी, विकेट की ओर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक दिया। ऐसा करना खेल के नियमों के विरूद्ध है और रैना के साथ साथ कप्तान द्रविड़ ने भी अंपायर से इंज़माम को आऊट देने की अपील की, जिसे कि अंपायर ने मान लिया और इंज़माम को आऊट दे दिया। अब मोईन खान साहब को यह खुजली है कि द्रविड़ जैसे अनुभवी खिलाड़ी को इस मामूली से वाक्ये को अनदेखा कर देना चाहिए था, जैसे कि सौरव गांगुली कर देते यदि वे कप्तान होते!! खान साहब का कहना है कि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है(gentleman’s game) और द्रविड़ को गांगुली के अनुभवों से सीखना चाहिए। भारतीय टीम को जीतने की ऐसी धुन सवार है कि वे किसी भी कीमत पर जीतना चाहते हैं, या तो सीधे तरीके से या फ़िर टेढ़े तरीके से!! तो मेरा कहना है कि खान साहेब, यदि क्रिकेट सज्जन लोगों का खेल है तो फ़िर इंज़ी ने विकेट पर जाती गेंद को अपने बल्ले से रोक कर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन क्यों किया? और नियमों के विरूद्ध होते हुए भी आप कह रहें हैं कि भारतीय खिलाड़ियों को अपील नहीं करनी चाहिए थी? क्या यह पाकिस्तानी कप्तान की मूर्खता पर परदा करने का असफल प्रयास नहीं है? क्योंकि इंज़माम ने बाद में यह स्वीकार किया कि उन्हें इस नियम के बारे में नहीं पता था और वापस पैवेलियन लौटने के बाद ही उन्हें इस बारे में पता चला।
क्या करें, कन्ट्रोल नहीं होता!!
On 05, Feb 2006 | 3 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
ऐसा क्यों होता है कि कुछ चीज़ों पर हम यह जानते बूझते भी काबू नहीं रख पाते कि अति बुरी है। वैसे तो अति हर चीज़ की बुरी होती है, पर यह ज्ञान रखने के बाद भी क्यों हम काबू नहीं रख पाते? यह बहस का मुद्दा है, क्योंकि इसका संबन्ध मनुष्य की इच्छा शक्ति से है, जितना व्यक्ति का मन पर संयम होगा, उतना ही वह ऐसी स्थिति में आने से बचेगा। परन्तु दोषहीन कोई नहीं होता, किसी का भी अपने मन पर पूरा नियंत्रण नहीं होता, यह तो प्रकृति का नियम है। प्रत्येक व्यक्ति की कुछ कमज़ोरियाँ होती हैं जिनके आगे वह विवश हो जाता है। पर यह तो तय है कि इसके पीछे क्या चिंतन है और मन पर संयम कैसे रखा जाए, इसका उत्तर तो कोई महान बुद्धिजीवी ही दे सकता है!! 🙂
रफ़्तार ११० कि.मी.
On 03, Feb 2006 | 9 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
अभी कुछ ही दिन पहले “द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया – द लायन, द विच एण्ड द वार्डरोब” देखने के बाद मन में आया कि शृंखला के बाकी उपन्यास लाकर पढ़ डालूँ, कहानी बड़ी रोचक लग रही है और साथ ही सोचा कि रॉबर्ट लडलम के आखिर में आए एकाध उपन्यास जो नहीं पढ़ें हैं, लगे हाथ वह भी ले आएँ, क्योंकि विश्व पुस्तक मेले में तो अपना भाग्य ने साथ न दिया। परसों सांय का समय था, ७ बज रहे थे, जाना था साउथ-एक्स स्थित बुकमार्क पर, लगभग २३ किलोमीटर का रास्ता था, और ८ बजे दुकान बंद हो जाती है। और इस समय रिंग रोड पर यातायात की भीड़, तौबा!!
द सौरव कॉन्सपिरेसी!!
On 02, Feb 2006 | 4 Comments | In Sports, खेल | By amit
सावधान:- इस पोस्ट में मेरे विचार कई जगहों पर कुछ उग्र भाषा में दिए गए हैं जो कि संभव है कई लोगों को पसंद न आएँ, हालांकि मैंने किसी अश्लील भाषा का प्रयोग नहीं किया है। इसलिए यदि आगे पढ़ना है तो इस बात को स्वीकार कर पढ़ें कि मैं अपनी उग्र भाषा और लहज़े के प्रति कोई बेकार की टिप्पणी नहीं स्वीकार करूँगा, यदि आपको सभ्यता का पाठ पढ़ाने का शौक है तो कहीं और जाईये!!
गई भैंस पानी में!!
On 01, Feb 2006 | 2 Comments | In Sports, खेल | By amit
दो मैच बेजान पिचों पर खेलने के बाद जब आखिरी टैस्ट मैच में कुछ जानदार हरी पिच मिली, तो लोगों को कुछ आशा बंधी कि आखिरकार मैच में हार-जीत का निर्णय होगा। कप्तान साहब राहुल “दीवार” द्रविड़ ने जब टॉस जीत क्षेत्ररक्षण का निर्णय लिया तो भंवे तो उठी पर यह सोच मन को तसल्ली दी कि अच्छा है, वरना रावलपिंडी एक्सप्रैस इस हरी पट्टी पर भारतीय बल्लेबाज़ी को उड़ा ले जाती। जब इरफ़ान पठान ने हैट-ट्रिक ली, तो मन में अनार-फ़ुलझड़ियाँ फ़ूटने-जलने लगे, पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों को झटपट गिरते देख ऐसा लगा कि मानो दीपावली आ गई हो। पर अपने बल्लेबाज़ भी कहाँ कम हैं, प्रतियोगिता की भावना तो उनमें सदैव से ही रहती है, पैविलियन में फ़टाफ़ट वापस लौट आराम करने की तो उन्हें भी जल्दी थी, इसलिए पाकिस्तानी गेन्दबाज़ों को अपने विकेट उपहार स्वरूप प्रदान कर वे भी वापस लौटने लगे। दूसरे दिन के अंत तक सभी निपट लिए थे। तो यानि कि तीन दिन बचे रहे और दो पारियाँ, यानि कि यदि कुछ असाधारण न हो तो खेल का निर्णय पक्का था।
नारनिया का इतिहास - शेर, जादूगरनी और अलमारी.....
On 31, Jan 2006 | 6 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
मैंने कुछ दिन पहले, वाल्ट डिज़नी द्वारा प्रस्तुत, सी.एस.लुईस के लिखे उपन्यास पर बनी इस फ़िल्म, “द क्रानिकल्स आफ़ नारनिया – द लायन, द विच एण्ड द वार्डरोब“, का ज़िक्र किया था। तब यह फ़िल्म यहाँ भारत में रिलीज़ नहीं हुई थी, और मात्र इसका ट्रेलर देखने के बाद ही मैंने कह दिया था कि यह फ़िल्म वाकई में देखने वाली होगी। पर तब कदाचित् मैं गलत था, यह फ़िल्म बढ़िया नहीं बल्कि बहुत बहुत बढ़िया है। कल इस फ़िल्म को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, और यह फ़िल्म वाकई अदभुद है, यह कैसी है, वह तो जो इसको देख ले वही जान सकता है, कम से कम मैं तो इसे शब्दों में व्यक्त नहीं कर पा रहा हूँ। लार्ड आफ़ द रिंग्स के बाद यह पहली फ़िल्म है जो कि उतनी ही बढ़िया लगी।
विश्व पुस्तक मेला!!
On 30, Jan 2006 | 7 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
कल, रविवार 29 जनवरी को एक मित्र के साथ दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे सत्रहवें विश्व पुस्तक मेले में जाने का कार्यक्रम बनाया था!! घर से सुबह निकलते निकलते देर ऐसी हुई कि ठीक से नाश्ता भी न कर पाया, जो मुँह में आया वो ठूँसा और सरपट निकल लिए!! दिन कुछ अधिक ही अच्छा था, क्योंकि बाहर सड़क पर आते ही पैट्रोल की सुईं पर नज़र पड़ी तो देखा कि टंकी लगभग खाली थी, पिछली रात ध्यान था कि भरवा लूँगा, लेकिन कुछ दोस्तों के साथ अचानक बाहर खाने का कार्यक्रम तय हो गया और उनके साथ ही निकल लिया, लौटने पर पैट्रोल की बात ध्यान से ही निकल गई!! खैर, अब अपनी सड़ी हुई याददाश्त और किस्मत को कोसते हुए मोटरसाईकिल सरपट दौड़ा दी पैट्रोल पंप की ओर, पहले ही देर हो रही थी, अब तो काम और भी बढ़िया हो गया था!! 😉
दोषहीन, निपुण, अद्वितीय प्रेमी!!
On 28, Jan 2006 | 21 Comments | In Mindless Rants, फ़ालतू बड़बड़ | By amit
अब भई, अल्का ने मुझे टैग कर अपना शिकार बनाया है तो हर्जाने के रूप में मुझे भी उनके विषय “निपुण प्रेमी”(perfect lover) पर अपनी राय व्यक्त करनी है कि मेरे अनुसार मेरी निपुण अथवा अद्वितीय प्रेमिका कैसी हो, अथवा यूँ कहें कि मेरे मन में क्या छवि है एक आदर्श प्रेमिका की। इस खेल के कुछ नियम हैं जो मुझे अल्का द्वारा ही पता चले, और वे हैं:
