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पुष्कर - भाग २

On 16, May 2012 | 2 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit

पिछले अंक से आगे …..

थोड़ा ऊपर जाकर सोचा कि देखें पुष्कर कैसा लगता है। बात यूं है कि ऊँचाई से किसी भी शहर आदि को देखने का अपना अलग ही मज़ा है। बड़े शहरों में यह मज़ा आप किसी ऊँची इमारत पर चढ़ कर ले सकते हैं, उनकी कोई कमी नहीं होती लेकिन पुष्कर जैसे शहर में, जहाँ कदाचित्‌ ही कोई इमारत चार-पाँच मंज़िला से ऊँची होगी, यह काम किसी पहाड़ी पर चढ़ कर ही किया जा सकता है और ठीक ऐसी ही एक पहाड़ी पर आधा हम लोग चढ़ चुके थे। तो जो नज़ारा हमने देखा वह आप भी देखो!! :tup:

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पुष्कर - भाग १

On 10, May 2012 | 6 Comments | In Wanderer, घुमक्कड़ | By amit

बहुत दिन हुए थे कहीं घूमना फिरना नहीं हुआ था। जब से पिछले वर्ष अगस्त में दिल्ली वापसी हुई उसके बाद से मानो ज़िन्दगी थम सी गई, ठहराव आ गया था। अब घर वालों की सुनें तो इस वर्ष जनवरी में जो सुबह-गए-रात-वापस टाइप जो हरिद्वार जाना हुआ था वह इस ठहराव को छिन्न-भिन्न करने के लिए काफ़ी था, बोले घूम-फिर तो आए तुम, अब क्या करना है घड़ी-२ घूमने की रट छोड़ो। अब मैं समझाता कि वो तो एक मित्र को उसकी शादी से पहले पाप मुक्त कराने गंगा जी के पवित्र जल में डुबकी लगवाने के लिए जाना भर हुआ था बस, कोई घूमने फिरने के लिए थोड़े ही गए थे, तो इस पर घरवालों का ऐसा घूरना होता कि मानो हम बेअक्ल हो और अहमकपन वाली बात कर रहे हों। :???:

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यात्रा के दौरान फोटो कैसे सुरक्षित रखें?

कुछेक लोगों ने मुझसे पूछा कि छुट्टियाँ मनाने जब जाते हैं तो डिजिटल कैमरा आदि साथ होता है, कई बार हुआ कि कार्ड भर गया या खराब हो गया, ऐसे में मूड बिगड़ जाता है। यदि घूमने-फ़िरने के दौरान ही कार्ड आदि खराब हो जाए तो मन खराब होता है छुट्टी का मज़ा बिगड़ता दिखता है लेकिन जल्दी ही सामान्य हो जाता है। परन्तु यदि छुट्टियों से वापस आकर पता चलता है कि कार्ड खराब हो गया है तो बहुत कोफ़्त होती है क्योंकि छुट्टी की यादें, बढ़िया सुहानी जगह आदि की जो तस्वीरें कैमरे में कैद की होती हैं वो वापस नहीं आ सकती। अब आखिर दोबारा उसी जगह पर मात्र री-टेक करने के लिए थोड़े ही जाएँगे!! ;) तो ऐसे में क्या किया जाए, किस तरह सावधानी आदि बरती जाए कि यह सब होने की संभावना न के बराबर हो जाए?

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मूर्खों की जमात.....

नोट : मेरा उद्देश्य यहाँ किसी का उपहास करना नहीं है, केवल विचार प्रकट करना और ज्ञान बाँचना मात्र है।

मूर्खों की जाति बहुत पुरानी जाति है, कह सकते हैं कि बाबा आदम के ज़माने से चली आ रही वंशावली है। लोग कहते हैं कि चंद्रवंशी सम्राट भरत पहले राजा थे जिन्होंने इस बात को तरजीह दी कि योग्य व्यक्ति को राजा बनना चाहिए, राजा के अयोग्य पुत्र को सिर्फ़ इसलिए राजा नहीं बनाना चाहिए क्योंकि वह राजा का पुत्र है। पर यह प्रथा उनके बाद उनके वंश में बहुत आगे नहीं चली। राजा प्रतीप के बाद शंतनु को सिंहासन इसलिए मिला क्योंकि बड़े भाई ने कोढ़ी होने के कारण सन्यास ले लिया था और मझले को राज्य करने में कोई रुचि नहीं थी (इससे पहले भी यह चलन शुरु हो गया होगा लेकिन मुझे कहीं संदर्भ मिला नहीं)।

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टू ई-बुक ऑर नाट.....

अब क्या परंपरागत किताबों को छोड़ दें? नए ईश्टाइल की बिना कागज़ की किताबों को अपनाएँ? ये प्रश्न काफ़ी समय से बार-२ ज़ेहन में उठते और बार-२ मैं इनको टाल देता कि नहीं अभी ई-बुक पर कैसे जाएँ, कागज़ की किताब को हाथ में लेकर पढ़ने की जो फील है, उसमे जो बात है वह किसी और चीज़ में नहीं आ सकती। कुछेक वर्ष पूर्व मैंने प्रयास किया था ई-बुक पढ़ने का लेकिन मज़ा नहीं आया कंप्यूटर की स्क्रीन पर आँख गड़ाकर पढ़ने में, या यूँ कह सकते हैं कि मन में ही एक मेंटल ब्लॉक था जो कि इस डगर पर आगे बढ़ने नहीं दे रहा था। :neutral:

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समीक्षा की समीक्षा: एजेन्ट विनोद

काफी समय हो गया कुछ लिखे, फ़िल्म की समीक्षा लिखे भी (कोई तीन साल पहले लिखी थी आखिरी समीक्षा, उसके बाद फ़िल्में तो बहुत देखी लेकिन लिखा किसी के विषय में नहीं), तो सोचा की परसों देखी एजेंट विनोद की समीक्षा ही लिख दें। इस फ़िल्म पर तथाकथित ज्ञानी लोगों अर्थात आलोचकों की काफी समीक्षाएँ आ चुकी हैं, परन्तु फ़िल्म देखने से पहले मैंने इन समीक्षाओं को पढ़ना मुनासिब नहीं समझा। प्रायः होता यह है कि इन एक्सपर्ट्स की समीक्षाओं का कोई सिर-पैर नहीं बनाता, बस यूं ही तू कौन मैं खामखा टाइप लिख डालते हैं जो जी में आया या फिर जो किसी ने चढावा देकर लिखवा लिया। तो इसलिए तय किया गया कि पहले फ़िल्म देख आएँ उसके बाद देखेंगे कि क्या और क्यूं लोग गरिया रहे हैं।

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