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दूरदर्शन के पचास वर्ष और खोती प्रासंगिकता

पंकज ने बताया कि दूरदर्शन के पचास वर्ष हो गए हैं और वह अपनी स्वर्ण जयंति मना रहा है। इसी के चलते पंकज ने दूरदर्शन के स्वर्ण काल के कुछ लोकप्रिय कार्यक्रमों की सूचि छापी है और कहा कि दूरदर्शन आज अपनी प्रासंगिकता खो रहा।

मैं समझता हूँ कि दूरदर्शन ने आऊट ऑफ़ डेट होना और बोर करना बीस साल पहले ही शुरु कर दिया था लेकिन उस समय लोग इसलिए झेल रहे थे कि निजी चैनल नहीं थे, केबल टीवी नब्बे के दशक में आया और शुरुआती दिनों में महंगा था। लेकिन जैसे-२ उसके दाम नीचे आते गए और लोगों को मज़ा आना शुरु हुआ वैसे-२ उसकी पैठ बढ़ने लगी और दूरदर्शन की ग्राहकी कम होती गई।

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एक और टैग.....

कोई दो-ढाई सप्ताह पूर्व जनाब मसिजीवी फेसबुक (Facebook) पर एक टैग अपने को थमा दिए जिसमें पचास सवाल थे जिनका आशय अपने बारे में जानकारी निकलवाना था। फुर्सत में था इसलिए तुरंत दस मिनट में ही टैग को निपटा के वहीं फेसबुक पर ठेल दिया। अब साथी लोग इधर आजकल अपने ब्लॉगों पर बासी माल को नई पैकिंग में पुनः बेच रहे हैं, इधर अपनी भी ट्यूब आजकल खाली है और भरने की प्रतीक्षा है, अनूप जी पहले ही फुनवा पर कह चुके हैं कि फोटू ठेल कर आजकल काम चलाया जा रहा है। इसी के चलते सोचा कि चलो बासी माल न सही लेकिन दूसरी दुकान पर रखा सामान इधर भी रख दें हिन्दी अनुवाद के साथ, छपास पिपासा भी मिटेगी और इधर के ग्राहकों के लिए नया माल भी हो जाएगा!! 😀

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On 04, Aug 2009 | One Comment | In कतरन | By amit

शेर शाह सूरी के दरबार के एक अफ़गान सामंत इसा खान का मकबरा

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संपूर्णता.....

कल मैंने नैनोफिक्शन के विषय में लिखा था कि इस विधा में कथा को 55 शब्दों में ही समेटना होता है और उसके कुछ अन्य नियम भी बताए थे। यह नैनोफिक्शन अर्थात्‌ पचपन शब्दिया कथा की विधा में मेरा पहला प्रयास है। एन्सी ने सही कहा था, वाकई कठिन कार्य है पचपन शब्दों में कथा को समेटना।

 

“स्त्री माँ बनने पर ही पूर्ण होती है”, माँ ने युवा होने पर समझाया था। वह माँ नहीं बन सकती थी, जान का खतरा था। पाँच वर्षों से सास उसे ताने दे रही थी।
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नैनोफिक्शन.....

जून में एन्सी ने नैनोफिक्शन (nanofiction) पर एक पोस्ट अपने ब्लॉग पर लिखी, और उसमें कुछ अति लघु कथाएँ भी छापी। जब जून के अंतिम सप्ताहांत पर छुट्टियाँ मनाने नाहन गए तो उस समय इस पर और ज़िक्र हुआ कि आखिर यह मामला है क्या।

जिस तरह फ्लैश फिक्शन (flash fiction) होती है कुछ उसी तरह नैनोफिक्शन (nanofiction) है, या यूँ कहें कि फ्लैश फिक्शन का और भी अधिक छोटा कर दिया गया रूप है। फ्लैश फिक्शन में प्रायः कथा 300 से 1000 शब्दों में होती है, कोई निर्धारित सीमा नहीं है, कथाकार पर निर्भर करता है, कुछ लोग 300 शब्दों में निपटा देते हैं और कुछ 1000 शब्दों तक ले जाते हैं। लेकिन नैनोफिक्शन में निर्धारित सीमा है, कथा 55 शब्दों से अधिक नहीं हो सकती। इसका प्रचलित नाम 55 फिक्शन (55 Fiction) है। अब इस नैनोफिक्शन अर्थात्‌ 55 फिक्शन के कुछ नियम है:

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